Tuesday, 10 May, 2011

न जाने मुझे अपने फन पर गरूर क्यों हैं,

कुछ उम्दा से "शैदाई" लब्जो की आस में !
निकला हूँ फिर मैं एक गम की तलाश में!
न जाने मुझे अपने फन पर गरूर क्यों हैं,
दर्द मेरा ही नहीं हैं मेरा, जब मेरे पास में !

1 comment:

  1. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति , आभार.


    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारने का कष्ट करें.

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