Tuesday 30 November 2010

आइना देखने का शौक भी अब वो नहीं रखते !

हर शख्स खुद को समझता हैं निजाम ए दुनिया,
जिस तरफ चाहे "शैदाई" वो उंगुली उठा देता हैं
वो चलें हैं अंग्रेजी में बदलने किस्मत उनकी
जिनको इल्म ही नहीं कि "क" से कबूतर होता हैं
चिराग बनेगा तो तेरे हिस्से में अँधेरा आएगा
वर्ना पतंगा भी घर जला बस्ती जगमगा देता हैं
आइना देखने का शौक भी अब वो नहीं रखते
कमबख्त क्या हैं कि हैसियत जो दिखा देता हैं!

4 comments:

  1. सिर्फ एक शब्द... वाह...

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  2. कबूतर कमबख्‍त नहीं होता
    बैठता कभी नहीं तख्‍त पर

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  3. आप सभी का तहेदिल से धन्यवाद् !

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