Wednesday, 14 July, 2010

मैं परिंदा हूँ

मैं परिंदा हूँ
मुझे हैं उड़ जाना
दूर कहीं आशिया बनाना
और लौट कर न आना
शाम को कहीं टहरना
भोर मैं फिर निकल पड़ना
नया जन्म लेना और रोज मरना
ये मेरी आस मेरी तलाश
मरू ह्रदय को प्रेम की पिपाश
कभी खत्म न होगी
मंदिर मस्जिद और गुरूद्वारे
उजड़े से शहर,
चहलकदमी भरे गलियारे
न मेरा दिल बहला सके
रंजोगम से "शैदाई" न निजात पा सके
लेकर एक अचेतन मन मैं जिन्दा हूँ
अपनी फितरत पर शर्मिदा हूँ
हाँ बस मैं परिंदा हूँ

1 comment:

  1. अपनी फितरत पर शर्मिदा हूँ
    ===
    awesome. chitthajagat men apne bolg ko register karen.

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